ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समानांतर सिनेमा में पारंपारिकता तथा आधुनिकता का निर्वहन करती स्त्री
सुषीला कुजूर1, आभा रूपेन्द्र पाल2
1शोधार्थी, इतिहास अध्ययन शाला, पंडित रविषंकर शुक्ल विश्व विद्यालय, रायपुर (छ.ग.)
2प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास अध्ययन शाला, पंडित रविषंकर षुक्ल विष्वविद्यालय, रायपुर
’ब्वततमेचवदकपदह ।नजीवत म्.उंपसरू
शोध सारांशरू
नारी जो समाज की धुरी है वह समानांतर सिनेमा की भी केन्द्र बिन्दु रही है। नारी भारतीय समाज में आज भी दो राहों पर खड़ी है-परम्परावादी बनाम आधुनिक-आधुनिक की परिभाषा हर बार दषक बा दषक बदल जाती है-समयानुसार कभी उसके पहनावे से, कभी उसके दिखने, रूप-रंग से-पर वास्तव में आधुनिकता का अर्थ ‘‘सोच‘‘ से है। इस दृष्टिकोण से समान्तर सिनेमा में नारी के इन दोनो रूपों को बखूबी दो विभिन्न कथानक में पिरोकर निर्देषकों द्वारा उभारा गया। सिनेमा का प्रारंभिक इतिहास समानांतर सिनेमा के बहुत पहले प्रारंभ हो चुका था। एक आंदोलन के रूप में समानांतर सिनेमा का आरंभ छठे दषक में होता है। साठ के दषक के मध्य में बौद्धिक समाज में एक वैचारिक आंदोलन का उदय हुआ। बौद्धिक प्रतिभाओं का सिनेमा के प्रति रूझान बढ़ा और फिल्म अपने आदर्षवाद को छोड़कर यथार्थवाद की ओर आगे बढ़ी। यथार्थ को कहने का साहस समाज की वास्तविक तस्वीर तथा उद्देश्यपूर्ण समानांतर फिल्में विकसित हुईं जिसके महत्वपूर्ण फिल्मकार मुजफ्फर अली, राजिंदर सिंह बेदी, श्याम बेनेगल, बासु भट्टाचार्य, उत्पलेंदु चक्रवर्ती, नंदिता दास आदि है। 70 का दषक भारतीय सिनेमा में समांतर सिनेमा का दौर था। समांतर सिनेमा की स्त्रियाॅं विद्रोहिणी तथा अपने लिए नये राह को तलाषती स्त्रियांॅ हैं जिन्होने समाज की वास्तविकता को यथार्थ के साथ समान्तर सिनेमा में प्रस्तुति दी है। व्यावसायिक सिनेमा (मुख्यधारा कमर्षियल) में स्त्री को कोमलांगी तथा शेग की वस्तु मात्र बनाया गया था किन्तु समांतर सिनेमा में बदलते सामाजिक-राजनीतिक परिदृष्य में स्त्रियांॅ स्वयं को एक मनष्य के रूप में प्रतिष्ठित की यही समांतर सिनेमा की ताकत है।
कुँजी शब्दरू यथार्थवाद, बौद्धिकता, कोमलांगी, विद्रोहिणी, चमक-दमक, समानांतर, व्यावसायिकता।
प्रस्तावनाः
इतिहास उस अतीत का अध्ययन है जो वास्तव में घटित हुआ है। साहित्य के माध्यम से उसे रोचक तरीके से प्रस्तुत किया जाता है, साहित्य को और भी सुन्दर दृष्य-श्रव्य माध्यम से कथानक, संगीत के साथ सिनेमा का रूप दिया गया, यह ना केवल रूचिकर है, मनोरंजक है बल्कि समाज से जुड़ा भी है जो वास्तविक है, सचमुच घटित हुआ है, तथ्य परक है, वह इतिहास है। समाज से जो भी जुड़ता है उसमें इतिहास का अंष अवष्य होता है क्योंकि केवल कल्पना के आधार पर सामाजिक घटनाएं कभी घटित नहीं हो सकती है। समाज में जो निरंतरता है वह इतिहास की देन है जो परिवर्तन है वह इतिहास की देन है, सामाजिक समस्याओं, घटनाओं और परिवर्तनों की खूबसूरत प्रस्तुति समानान्तर सिनेमा की विषेषता रही है। नारी जो समाज की धुरी है वह समानांतर सिनेमा की भी केन्द्र बिन्दु रही है।
नारी भारतीय समाज में आज भी दो राहों पर खड़ी है-परम्परावादी बनाम आधुनिक-आधुनिक की परिभाषा हर बार दषक बा दषक बदल जाती है-समयानुसार कभी उसके पहनावे से, कभी उसके दिखने, रूप-रंग से-पर वास्तव में आधुनिकता का अर्थ ‘‘सोच‘‘ से है। इस दृष्टिकोण से समान्तर सिनेमा में नारी के इन दोनो रूपों को बखूबी दो विभिन्न कथानक में पिरोकर निर्देषकों द्वारा उभारा गया। सिनेमा का प्रारंभिक इतिहास समानांतर सिनेमा के बहुत पहले प्रारंभ हो चुका था।
भारत में सिनेमा के आरंभिक दौर में महारानी विक्टोरिया के शासन के साथ ही अंग्रेजों का शोषण भी अपने चरम पर था। भारतीय राष्ट्रीय कांगे्रस की स्थापना सिनेमा के जन्म के लगभग 10 वर्ष पूर्व ही हो चुकी थी। क्रांतिकारियों ने अंग्रजों के विरूद्ध सषस्त्र आंदोलन का बिगूल बजा दिया था। बंगाल में सन्यासियांे का विद्रोह तथा सिनेमा के प्रारंभ से ही भारत में सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक उथल-पुथल मची हुई थी। इसी दौरान बाम्बे के वाॅटसन हाॅटल में 07 जुलाई 1896 को सिनेमा का पहला प्रदर्षन किया गया।
सिनेमा माध्यम ने अपना दोहरा प्रभाव दर्षाया है। एक तरफ यह देष की भाषा संस्कृति और समाज को प्रभावित करता है तो दूसरी ओर स्वयं भी इसके प्रभाव से अछूता नहीं रहता है। सिनेमा की इसी विशेषता ने उसे मनोरंजन और संचार माध्यम के द्वारा अग्रसर होने का अवसर प्रदान किया। दादा साहब फाल्के ने ‘राजा हरिषचंद्र‘ फिल्म बनाई और बम्बई में सन् 1913 में कोरोनेषन थिएटर में प्रदर्षित किया जिसे भारत की पहली फिल्म होने का गौरव मिला है। यहीं से भारतीय सिनेमा की यात्रा प्रारंभ होती है। धीरे-धीरे भारतीय जनमानस सिनेमा के माध्यम से जुड़ता गया और यह मनोरंजन के साथ ही भारत की विविधता संस्कृति और सामाजिक सरोकारों तथा जनमानस की तीव्र अभिव्यक्ति का माध्यम बन गया।
एक आंदोलन के रूप में समानांतर सिनेमा का आरंभ छठे दषक में होता है। साठ के दषक के मध्य में बौद्धिक समाज में एक वैचारिक आंदोलन का उदय हुआ। बौद्धिक प्रतिभाओं का सिनेमा के प्रति रूझान बढ़ा और फिल्म अपने आदर्षवाद को छोड़कर यथार्थवाद की ओर आगे बढ़ी। भारतीय सिनेमा का कालखंड में विभाजन किया जाये तो 1898 से 1930 तक का काल मूक युग का रहा तथा 1930 से 1940 के मध्य काल में फिल्में सामाजिक विषयों पर बनने लगी। 40 के दषक से लेकर 60 के दषक तक का युग सिनेमा का ‘स्वर्ण युग‘ कहलाता है। इस युग में सामाजिक प्रतिबद्धता, रूमानी, यथार्थ, ऐतिहसिक तथा थ्रिलर और लोकप्रियतावाद के कथानक पर आधारित फिल्में बनीं। 60 के दषक के उत्तरार्ध में सिनेमा का दो भागों में विभाजन हो गया, एक व्यासायिक अर्थात् मुख्यधारा का सिनेमा तथा दूसरी ओर समानान्तर ंिसनेमा का दौर प्रारंभ हुआ जिसने सिनेमा को यथार्थ से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया था।
1960 में बम्बई प्रांत का महाराष्ट्र और गुजरात दो भागों में विभाजन किया गया और महाराष्ट्र राज्य की स्थापना की गई। इसी दौर में एस.के. पाटील फिल्म समिति के परामर्ष के अनुसार सरकार की ओर से सिनेमा निर्माण के लिए कम दरों पर कर्ज उपलब्ध कराने के लिए फिल्म फायनेंस कार्पोरेषन की स्थापना की थी। 1960 में ही पूणे के प्रभात स्टूडियो में भारत सरकार द्वारा फिल्म के विविध पक्षों के प्रषिक्षण हेतु ‘फिल्म संस्थान‘ स्थापित की गई। 1964 में पूना में भारत के सूचना प्रसारण मंत्रालय ने ‘राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय‘ की स्थापना की। 1966 में लाल बहादुर शास्त्री के निधन के पष्चात् इंदिरा गांधी प्रधान मंत्री बनीं। फिल्म इंस्टीट्यूट के निदेषक के पद पर ऋत्विक घटक को नियुक्त किया गया। इसी वर्ष से ‘दादा साहब फालके‘ पुरस्कार देने की परंपरा का आरंभ हुआ।
1967 मेें बंगाल के दार्जिलिंग से नक्सलबाड़ी आंदोलन ने आरंभ होकर धीरे-धीरे संपूर्ण पूर्वी भारत को अपने प्रभाव में ले लिया। 1968 में अरूण कौल और मृणाल सेन ने भारत सरकार के द्वारा प्रायोजित नए सिनेमा का घोषणा पत्र को जारी किया। इंदिरा गांधी ने मोरारजी देसाई के निष्कासन तथा 1969 में कांग्रेस को तोड़कर नई पार्टी का गठन किया। देष में 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। चारों तरफ सुधार, गरीबी हटाओ और समाजवादी विचारों की लहर चल रही थी, इसी पृष्ठभूमि में समानांतर सिनेमा आंदोलन का जन्म हुआ। मृणाल सेन की ‘भुवन सोम‘ और मणि कौल की ‘उसकी रोटी‘ से समानांतर सिनेमा प्रारंभ हुआ।
यथार्थ को कहने का साहस समाज की वास्तविक तस्वीर तथा उद्देश्यपूर्ण समानांतर फिल्में विकसित हुईं जिसके महत्वपूर्ण फिल्मकार मुजफ्फर अली, राजिंदर सिंह बेदी, श्याम बेनेगल, बासु भट्टाचार्य, उत्पलेंदु चक्रवर्ती, नंदिता दास, बुद्धदेव दासगुप्ता, चंद्रप्रकाष द्विवेदी, रवीन्द्र धर्मराज, शुभंकर घोष, के. हरिहरन, गौतम घोष, प्रकाष झा, चंद्रकांत जोषी, मनीष झा, गिरीष कर्नाड, अरूण कौल, गिरीष कासरवल्ली, मणि कौल, जगमोहन मुंदड़ा, कल्पना लाजमी, दीपा मेहता, विजया मेहता, केतन मेहता, प्रदीप किषन, गोविन्द, निहलाणी, महेष भट्ट, अमोल पालेकर, विनोद पांडे, सई परांजपे, जब्बार पटेल, अरूणा राजे, अपर्णा सेन, टी.एस.रंगा, तपन सिन्हा, के. विक्रम सिंह आदि हैं।
भारत में समांतर सिनेमा की प्रेरणा के चार मूल तत्व हैं, प्रथम महाराष्ट्र का 19 वीं सदी का समाज सुधार आंदोलन, बंगाल का 18-19 वीं सदी का नवजागरण, माक्र्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी का उदय तथा फ्रांस और इटली का नवयथार्थवादी सिनेमा। किसी भी देषकाल में स्त्रियों को समाज का एक महत्वपूर्ण घटक माना गया है। भारतीय संस्कृति में स्त्री-पुरूष समानता पर जोर दिया गया है। पूर्व वैदिक युग में स्त्री को समानता का अधिकार प्राप्त था, विधवा स्त्री का पुनर्विवाह होता था। पर्दा प्रथा नहीं थी तथा स्त्रियां घर से बाहर आ-जा सकती थीं, उन्हें पुरूषों के समान षिक्षा का अधिकार दिया गया था। उत्तरवैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति में कमी आती गई। मनुपरंपरा के अनुसार स्त्रियां जीवनपर्यन्त पुरूष के अधीन रहेंगी, बाल्यावस्था में पिता के संरक्षण में, युवावस्था में पति के तथा वृ़द्धावस्था में स्त्री को पुत्र के संरक्षण में रखा गया। पति को परमेश्वर मानने की परंपरा का प्रारंभ हुआ। विधवा विवाह पर रोक लगा दी गई तथा बाल-विवाह को आरम्भ किया गया।
मध्य युग में स्त्रियों की स्थिति सोचनीय हो गई थी। स्त्री का जन्म लेना समाज में अच्छा नहीं माना गया। मुसलमानों के आगमन के साथ ही स्त्रियाॅं पर्दे तथा चारदीवारी में कैद हो गई। भारत के अनेक समुदायों में सती प्रथा, बाल-विवाह तथा विधवा पुनर्विवाह पर पाबंदी लगा दी गई और यह सामाजिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया था।
उच्च वर्ग में अनेक विवाह का प्रचलन बढ़ गया था। भक्ति आंदोलन के काल में स्त्रियों की स्थिति में सुधार के प्रयास किये गये। औपनिवेषिक भारत में अंग्रेजी शासन के दौरान राजाराम मोहनराय, ज्योतिबा फूले, ईश्वर चंद्र विद्यासागर आदि सुधारकों ने स्त्रियों की स्थिति में सुधार के लिए अनेक संघर्ष किया। स्वतंत्र भारत में महिलाओं की भागीदारी प्रत्येक क्षेत्र जैसे-षिक्षा, राजनीति, मीडिया, कला-संस्कृति, सेवा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी में रही है। इंदिरा गांधी ने 15 वर्षों तक सर्वाधिक लम्बे समय तक प्रधान मंत्री का कार्यकाल संभाला।
70 का दषक भारतीय सिनेमा में समांतर सिनेमा का दौर था। समांतर सिनेमा की स्त्रियाॅं विद्रोहिणी तथा अपने लिए नये राह को तलाषती स्त्रियांॅ हैं जिन्होने समाज की वास्तविकता को यथार्थ के साथ समान्तर सिनेमा में प्रस्तुति दी है। व्यावसायिक सिनेमा (मुख्यधारा कमर्षियल) में स्त्री को कोमलांगी तथा शोभा की वस्तु मात्र बनाया गया था किन्तु समांतर सिनेमा में बदलते सामाजिक-राजनीतिक परिदृष्य में स्त्रियांॅ स्वयं को एक मनुष्य के रूप में प्रतिष्ठित की यही समांतर सिनेमा की ताकत है।
‘अंकुर‘
फिल्म ः अंकुर
वर्ष ः 1974
निर्देषक ः श्याम बेनेगल
कलाकार ः शबाना आजमी (लक्ष्मी), अनंत नाग (सूर्या), साधू मेहर (किष्ट्या)
अंकुर श्याम बेनेगल की पहली फिल्म है। ‘अंकुर‘ कहानी है लक्ष्मी की जो अपने गूॅंगे-बहरे पति किष्ट्या के प्रति पूर्ण समर्पित है। लक्ष्मी का पति बेराजगार है। लक्ष्मी स्वयं जमींदार के यहां नौकरानी का काम करती है। जमींदार का बेटा सूर्या का कम उम्र लड़की से विवाह हो जाता है और वह परीक्षा पास कर गांव आता है। सूर्या की नजर लक्ष्मी पर है। लक्ष्मी का पति ताड़ी चुराने के आरोप में अपमानित होकर गांव छोड़कर चला जाता है। लक्ष्मी अपनी गरीबी और अकेलेपन के कारण सूर्या की ओर आकर्षित होकर गर्भवती हो जाती है। सूर्या की पत्नी गांव से आती है। सूर्या समाज के डर से लक्ष्मी को बच्चा गिराने को कहता है जिसे सुनकर सूर्या की आज्ञा का पालन करने से लक्ष्मी इंकार कर देती है। भूख की तड़प उसे जमींदार के यहां चावल चुराने के लिए विवष करती है और पकड़ी जाती है। इसी बीच उसका पति गांव वापस आता है। लक्ष्मी का पति, पत्नी को गर्भवती देखकर खुष होता है, वह समझता है यह बच्चा उसका है। किष्ट्या काम मांगने सूर्या के पास जाता है। सूर्या को लगता है वह उसे मारने आ रहा है। किष्ट्या को मार-मार कर अधमरा कर देता है। लक्ष्मी के कोसने पर सूर्या को अपनी गलतफहमी का अहसास होता है। इसी बीच एक बालक द्वारा जमींदार के घर पर पत्थर फेंकना दर्षाता है कि सामंतों के अन्याय के विरूद्ध प्रतिकार का अंकुर हो चुका है।
सदियां बीतने के पष्चात् भी सामंती सोच वैसी ही बनी हुई है। स्त्री को व्यक्ति के स्थान पर वस्तु माना गया है। अंकुर फिल्म में नारी के प्रति समाज की सामंतवादी सोच पर प्रहार किया गया है। 70 का दषक इंदिरा गांधी के नेतृत्व का दषक था। श्रीमती गांधी का 1972 से 1975 तक का शासन केन्द्रीयकृत तथा अत्यधिक निरंकुषता का शासन था। सत्तावादी नीतियों ने देष में असंतोष उत्पन्न किया। पांचवीं पंचवर्षीय योजना 1974-1979 में बच्चो, गर्भवती माताओं तथा दूध पिलाने वाली माताओं के लिए परिवार नियोजन व पोषण के साथ न्यूनतम जनस्वास्थ्य सेवाओं को एकीकृत कर प्रदान करना था। इस दौरान पूर्व नियोजित योजनाओं की तरह ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को सुगम बनाना, क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करना, स्वास्थ्य देखभाल हेतु रेफरल प्रणाली का विकास तथा संक्रामक रोगों के नियंत्रण पर जोर दिया गया। पांचवीं पंचवर्षीय योजना का उद्देष्य उपेक्षित वर्गों का संवर्धन करना था। वैयक्तिक स्वास्थ्य षिक्षा तथा प्रषिक्षण हेतु गुणात्मक सुधार की आवश्यकता का अनुभव किया गया।
समांतर सिनेमा ने भी देष की सामाजिक स्थिति के प्रति अपने विरोध का परचम लहराया। अंकुर की स्त्री अनैतिक गर्भ को गलत नहीं मानती, वह मां बनना चाहती थी और इस इच्छा की पूर्ति उसका पति नहीं कर सका, अतः वो जमींदार के पुत्र द्वारा गर्भ धारण करती है। उसके लिए मां बनना सर्वोपरि है, पति द्वारा उसे पूर्ण रूप से स्वीकार करने पर वह अनैतिक संबंध समाप्त कर वास्तविक खुषी प्राप्त करने के लिए पूर्णतया पति के प्रति समर्पित हो जाती है। स्त्री अपने लिए सही गलत का चुनाव पढ़ी-लिखी नहीं होने के बावजूद अपनी अंतर्दृष्टि (प्दजनपजपवद) से अंततः सही निर्णय लेती है।
पुरूष सत्ता तथा सामंतवाद के विरूद्ध बालक द्वारा पत्थर फेंकने से नई पीढ़ी के माध्यम से अंकुर को दर्षाया है, आने वाली पीढ़ी पुरानी सोच को बर्दाष्त नहीं करेगी। स्त्री का अपनी देह पर एकाधिकार, सामंती प्रवृत्ति, स्त्री षोषण धर्म के नाम पर पाखंड, पितृ सत्ता सभी का एक साथ यह फिल्म विरोध करती है। सत्ता के बदलाव को अंकुर के माध्यम से चित्रित किया गया है। अंकुर की स्त्री पारंपरिक भी है। प्रेम, पति, संतान सभी आकांक्षाओं को सही अर्थ में प्राप्त करने के लिए परिवार और पति के पास वापस लौटती है। समाज में नये प्रतिमान खड़े करती है। नई सोच और उस सोच के क्रियान्वयन को ‘अंकुर‘ फिल्म में स्त्री के मन की यात्रा को परत दर परत दर्षाया गया है।
समानांतर सिनेमा ने आम लोगों के जीवन में देष की राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक समस्याओं से प्रेरित यथार्थवादी कथा को अपने सिनेमा में सम्मिलित किया है। ‘अंकुर‘ आंध्रप्रदेष की जमींदारी व्यवस्था से उपजी सामंती प्रवृत्ति तथा दलित खेतिहर मजदूर और उसकी पत्नी के दैहिक शोषण पर कुठाराघात करती है। ‘अंकुर‘ में पिछली पीढ़ी के अत्याचार से मुक्ति के लिए प्रतीक स्वरूप बालक द्वारा पत्थर फेंकने की घटना का चित्रण किया गया है। ‘अंकुर‘ की नायिका लक्ष्मी जिस प्रकार कस्तुरी की सुगंध से व्याकुल हिरन उसको बाहर ढूंढता है जबकि वह खषबू उसके भीतर से ही आती है, उसी प्रकार लक्ष्मी अपने अस्तित्व की तलाष में बाहर जमींदार के पुत्र सूर्या से सुख प्राप्त करने की असफल कोषिष करती है और अंततः लक्ष्मी को वास्तविक खुषी और अस्तित्व की तलाष अपने पति किष्ट्या के साथ ही पूर्ण होती है। यह फिल्म नायिका की पारंपारिकता की ओर लौटने अर्थात् पारंपारिकता का निर्वहन करती स्त्री का चित्रण करती है।
‘एक बार फिर‘
फिल्म : एक बार फिर
वर्ष : 1980
निर्देषक : विनोद पांडे
कलाकार : सुरेष ओबेराय (महेन्द्र), दीप्ति नवल (कल्पना), प्रदीप वर्मा (विमल), सईद जाफरी
कल्पना (दीप्ति नवल) और महेन्द्र कुमार (सुरेष ओबेराय) ने प्रेम विवाह किया था। शूटिंग के दौरान लंदन प्रवास में महेन्द्र कुमार सफलता प्राप्त करने के साथ ही उसके भीतर अहं तथा स्वच्छंदता की प्रवृृत्ति दिनांे दिन बढ़ती जाती है। कल्पना पति के साथ रहते हुए भी एकाकी जीवन जीती है, अपनी बोरियत दूर करने के लिए आर्ट स्कूल में प्रवेष लेती है। आर्ट क्लास में विमल (प्रदीप वर्मा) के आकर्षण में अंतरंग होती है। अपराधबोध के कारण वह पति को फोन करती है, दूसरी ओर स्त्री की आवाज सुनकर उसका पति से पूर्ण रूप से मोहभंग होता है। कल्पना की दुविधा समाप्त होती है और वह प्रेमी के साथ अपने रिष्ते को स्वीकारती है। पति का त्याग कर नये रिष्ते की ओर कदम बढ़ाती है जो उसके आधुनिक होने का प्रमाण है।
80 के दषक में श्रीमती इंदिरा गांधी की कांग्रेस पार्टी विजयी होने के पष्चात् 14 जनवरी 1980 को पुनः प्रधानमंत्री का पद संभालती है। उपरोक्त फिल्म पुरूषप्रधान सोच के प्रति एक विद्रोह है। नायिका कल्पना ने महेन्द्र के साथ प्रेम विवाह किया था और पति उसकी उपेक्षा करता है। इसी दौरान वह दूसरे पुरूष के साथ अंतरंग होती है और अपराधबोध के कारण फिल्म के शीर्षक के अनुसार अपने रिष्ते को ‘एक बार फिर‘ अवसर देती है। पति-पत्नी के संबंधों को धैर्य और समय देने की आवयकता होती है जिससे दोनो के मध्य आपसी समझ विकसित हो सके। कुछ दिनों पष्चात् कल्पना अपने पति को जो दूसरे शहर शूटिंग के सिलसिले में गया है, फोन लगाती है, उधर से स्त्री की आवाज सुनकर उसके भीतर का अपराध बोध समाप्त हो जाता है।
विवाह के पष्चात् स्त्री के लिए उसका पति ही उसकी दुनिया है जिसमें पत्नी किसी और स्त्री के प्रवेष को सहन नहीं कर सकती। कल्पना पति के लिए उपभोग की वस्तु थी, जिसके मन को पति ने कभी नहीं समझा। पति के साथ रहते हुए कल्पना ने उसकी रंगरलियों को बर्दाष्त किया, स्वयं खामोष रहकर, गुड़िया बनी रहने की विवषता के स्थान पर उसने विमल के सच्चे प्रेम को स्वीकार किया। विवाहेत्तर संबंध को समाप्त कर और पति के रिष्ते को भी त्याग कर उसने पूर्णरूप से विमल के प्रेम को अपनाया। नये रिष्ते में उसे सच्ची खुषी मिली, परंपरागत पति के साथ संबंधों को ढोते रहने की विवशता से मुक्त होकर अपने अस्तित्व की तलाष को प्रेमी के साथ पूर्ण करती है और वह जीवंतता तथा जीवन की निरंतरता को प्राप्त करती है। द्वैत के द्वंद से मुक्त होकर अद्वैत रूपी प्रेम की संपूर्णता में स्वयं का एकाकार करती है।
1980 में छठवीं पंचवर्षीय योजना पिछले तीस वर्षों के अनुभव पर आधारित थी। योजना का लक्ष्य ग्रामीण तथा असंगठित क्षेत्रों में विकास और रोजगार के अवसर में वृद्धि करना था। महिलाओं को समाज में उचित स्थान दिलाने हेतु संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रेरणा द्वारा प्रथम विष्व सम्मेलन 19 जून से 2 जुलाई तक मैक्सिको सिटी में सन् 1975 को हुआ था। इसी सम्मेलन में 1975-1984 को महिला दषक के रूप में घोषित किया गया। महिला षिक्षा, महिला रोजगार, नीति निर्धारण में महिलाओं को सम्मिलित करने हेतु एवं लिंग भेद मिटाने, समान नागरिक, राजनैतिक एवं सामाजिक अधिकार से संबंधित मुद्दे रखे गये। प्रथम विष्व महिला सम्मेलन के आधार पर ही द्वितीय विष्व महिला सम्मेलन का आयोजन 14 जुलाई से 31 जुलाई तक 1980 में कोपनहेगन में आयोजित किया गया। जिसमें महिलाओं के लिए विकास से संबंधित आयोग बनाने, गुणात्मक तथा संख्यात्मक लक्ष्य निर्धारित करना, राजनीति एवं निर्णय निर्धारण में महिलाओं की कानूनी भागीदारी सुनिष्चित करना, समाचार माध्यम द्वारा महिला समस्याओं तथा मुद्दों को प्रस्तुत करने के उपायों का अध्ययन करना तथा उनमें सुधार लाना, सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों के बीच सहयोग स्थापित करना था।
आर्थिक एवं सामाजिक विकास पूर्णरूप से हो तथा सभी को षारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराना एंव प्रषिक्षण और षिक्षण के स्तर पर सभी को समानता देना लक्ष्य रखा गया। 80 के दषक में महानगरों में स्त्रियां कामकाजी होने लगी, घर और बाहर दोनो क्षेत्रों में सामंजस्य स्थापित करना अपने अस्तित्व को प्राप्त करना उस दौरान महिलाओं के समक्ष ज्वलंत मुद्दे थे। इंदिरा गांधी का पुनः प्रधानमंत्री बनना समस्त स्त्रियों के लिए प्रेरणास्त्रोत बना। स्त्रियां धीर-धीरे राजनीति तथा समाज के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी दावेदारी प्रस्तुत करने लगी। ‘एक बार फिर‘ की नायिका भी समाज के उन्हीं हालातों का सामना करती है और अंततः अपनी स्वतंत्र अस्तित्व की तलाष को पूरा करती है। आधुनिकता की ओर स्त्री के बढ़ते कदम को ‘एक बार फिर‘ फिल्म में दर्षाया गया है।
निष्कर्ष:-
सामाजिक परिवर्तन समाज में धीरे-धीरे परिलक्षित होता है। अधिकांष सिनेमा में जो कुछ भी दिखाया जाता है वह ग्लैमर से परिपूर्ण, कल्पना (फैन्टेसी) पर आधारित व्यावसायिक सिनेमा का अभिन्न हिस्सा है। वास्तविकता को समानांतर सिनेमा में दिखाया गया है। स्त्री का अस्तित्व, विवाहेत्तर संबंध, तलाक, अपनी देह पर अधिकार जैसे मुद्दे आज भी प्रासंगिक हैं। 50 साल पहले ये मुद्दे सिनेमा में विद्यमान थे, आज भी हैं। सामाजिक समस्या तथा स्त्री की समस्या में वर्तमान में भी कमी के स्थान पर वृद्धि ही हुई है। सिनेमा के प्रारंभ से ही स्त्री महत्वपूर्ण विषय रही है और हमेषा रहेगी।
संदर्भ ग्रंथ सूचीः-
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10 सिन्हा, प्रसून, भारतीय सिनेमाः एक अनंत यात्रा, श्री नटराज प्रकाषन, दिल्ली, 2006, पृ. 126
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12 सिंह, बी.एन., सिंह, जनमेजय, आधुनिकता एवं नारी सषक्तिकरण, रावत पब्लिकेषन, जयपुर, 2011
13 वरे, एस.एल., भारतीय इतिहास में नारी, कैलाष पुस्तक सदन, भोपाल, 2007, पृ. 79, 96
Received on 03.06.2018 Modified on 15.06.2018
Accepted on 23.06.2018 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2018; 6(2): 151-156 .